Sunday, August 30, 2009

ग़ज़ल /बात करते हैं हम मुहब्बत की

बात करते हैं हम मुहब्बत की,और हम नफ़रतों में जीते हैं ।
खामियाँ गैर की बताते हैं ,खुद बुरी आदतों में जीते हैं ।

सबको आगे आगे जाना है,तेज रफ़्तार जिन्दगी की हुई;
भागते दौड़ते जमाने में, हम बडी़ फ़ुरसतों में जीते हैं ।

आज तो ग़म है बेबसी भी है,जिन्दगी कट रही है मुश्किल से;
आने वाला पल अच्छा होगा , हम इन्हीं हसरतों में जीते हैं ।

आज के दौर मे जीना है कठिन,और मरना बडा़ आसान हुआ;
कामयाबी बडी़ हमारी है , जो ऐसी हालतों में जीते हैं ।

मिट्टी लगती है जो भी चीज मिली,जो भी पाया नहीं वो सोना लगा;
जो हमें चीज मिल नहीं सकती ,हम उन्हीं चाहतों में जीते हैं

कृपया बनारस के कवि/शायर,समकालीन ग़ज़ल [पत्रिका] में नई ग़ज़लें जरूर देंखे ...और टिप्पणी भी दें...

21 टिप्पणियाँ:

Science Bloggers Association said...

Sundar bhaav hain,
-Zakir Ali ‘Rajnish’
{ Secretary-TSALIIM & SBAI }

नीरज गोस्वामी said...

आज के दौर मे जीना है कठिन,और मरना बडा़ आसान हुआ;
कामयाबी बडी़ हमारी है , जो ऐसी हालतों में जीते हैं ।

बहुत खूब कहा है प्रसन्न जी...बधाई..
नीरज

हिमांशु । Himanshu said...

"आज तो ग़म है बेबसी भी है,जिन्दगी कट रही है मुश्किल से;
आने वाला पल अच्छा होगा , हम इन्हीं हसरतों में जीते हैं ।"

यही आशा जीने को प्रेरित करती रहती है । खूबसूरत रचना ।

BrijmohanShrivastava said...

सही है बात मोहब्बत की और जीना नफरत में .,तेज़ रफ्तार और फुर्सत एक अच्छा व्यंग्य ,तीसरा शेर उत्साह वर्धक ,सही है घबराते थे मरने से वो अब जीने से डरते हैं ,सही है घर की मुर्गी दाल बराबर

Murari Pareek said...

waah wahh bahut hi sundar wyang aur rang dono laajwaab !!

सुलभ सतरंगी said...

सबको आगे आगे जाना है, तेज रफ़्तार जिन्दगी की हुई;
भागते दौड़ते जमाने में, हम बडी़ फ़ुरसतों में जीते हैं ।

वाह भाई. ये तो मेरी बात हुई. अच्छा लगा.

आप भी सुने कुछ भागती दौरती

vikram7 said...

आज तो ग़म है बेबसी भी है,जिन्दगी कट रही है मुश्किल से;
आने वाला पल अच्छा होगा , हम इन्हीं हसरतों में जीते हैं
वाह,खूबसूरत रचना

Prem said...

sunder andaaz bayan karne ka aaj ki sachchai yahi hai.shubhkamnayen.

Apoorv said...

जो हमें चीज मिल नहीं सकती ,हम उन्हीं चाहतों में जीते हैं ।

जीवन की परिपूर्णता उसकी अत्रप्ति मे ही है..खूबसूरत गज़ल चतुर्वेदी जी!

राज भाटिय़ा said...

बहुत सुंदर रचना लिखी आप ने धन्यवाद

महफूज़ अली said...

आज के दौर मे जीना है कठिन,और मरना बडा़ आसान हुआ;
कामयाबी बडी़ हमारी है , जो ऐसी हालतों में जीते हैं ।


bahut khoob..... ati sunder

Mithilesh dubey said...

वाह बहुत खुब, दिल को छू गयी आपकी ये रचना,। लाजवाब

Babli said...

बहुत ही सुंदर भाव और अभिव्यक्ति के साथ लिखी हुई आपकी ये शानदार रचना दिल को छू गई!

Babli said...

मेरे नए ब्लॉग पर आपका स्वागत है-
http://ek-jhalak-urmi-ki-kavitayen.blogspot.com

raj said...

आज तो ग़म है बेबसी भी है,जिन्दगी कट रही है मुश्किल से;
आने वाला पल अच्छा होगा , हम इन्हीं हसरतों में जीते हैं ।..bahut achha likha aapne..

Rakesh Singh - राकेश सिंह said...

आज के एक आम इन्सान के मनोभावों को आपने शब्दों का बढिया जामा पहनाया है |

सरल और सुन्दर अविव्याक्ती |

अल्पना वर्मा said...

'आज के दौर मे जीना है कठिन,और मरना बडा़ आसान हुआ;
कामयाबी बडी़ हमारी है , जो ऐसी हालतों में जीते हैं ।'
वाह! वाह! वाह!
बहुत हि उम्दा शेर कहा है आप ने..
ग़ज़ल खूब कही है प्रसन्न जी आप ने.

कभी आप अपनी आवाज़ में भी कुछ जरुर सुनाईये.

[मेरे ब्लॉग पर आप की टिप्पणी मिली बहुत बहुत आभार.]

वाणी गीत said...

जो पाया नहीं वाही सोना था ..इंसानी फितरत की अच्छी तस्वीर बनाई है आपकी कविता ने ...आभार ..!!

Harkirat Haqeer said...

बात करते हैं हम मुहब्बत की,और हम नफ़रतों में जीते हैं ।
खामियाँ गैर की बताते हैं ,खुद बुरी आदतों में जीते हैं ।

sahi baat kahi hai aapne ....

'आज के दौर मे जीना है कठिन,और मरना बडा़ आसान हुआ;
कामयाबी बडी़ हमारी है , जो ऐसी हालतों में जीते हैं ।'

waah ji tabhi aajkaj kal suicide case jyada najaar aa rahe hai ....sab aapki nazmon ki dua hai ....!!

सुरेन्द्र "मुल्हिद" said...

PV ji,
thanks for viviting my blog...
ur ghazal is amazing....
pls keep on coming...
i m becoming ur follower..

शिवम् मिश्रा said...

"मिट्टी लगती है जो भी चीज मिली,जो भी पाया नहीं वो सोना लगा;
जो हमें चीज मिल नहीं सकती ,हम उन्हीं चाहतों में जीते हैं ।"


बहुत सुन्दर |

पर कुछ मुझे भी मिला है ....


ज़रा यहाँ भी निगाह डाले :- "बुरा भला" ने जागरण की ख़बर में अपनी जगह बनाई है |

http://in.jagran.yahoo.com/news/national/politics/5_2_5767315.html